क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे जीवन में किस्मत की क्या भूमिका है? अगर नहीं, तो इस पर बात करने का यही सही वक्त है। मैं मैल्कम ग्लैडवेल की किताब "आउटलायर्स" के एक उद्धरण से शुरू करना चाहूँगा:
"हम दिखावा करते हैं कि सफलता पूरी तरह व्यक्तिगत गुणों पर निर्भर है, लेकिन जो कहानियाँ हमने देखीं वे दिखाती हैं कि बात इतनी सरल नहीं। वे उन लोगों की बात करती हैं जिन्हें कड़ी मेहनत करने का अनोखा मौका मिला और जिन्होंने इन्कार नहीं किया। उन लोगों की जो ऐसे वक्त में बड़े हुए जब समाज मेहनत का इनाम देता था। उनकी सफलता सिर्फ उनकी अपनी नहीं। यह उस दुनिया की उपज है जिसमें वे पले-बढ़े।"
किस्मत निस्संदेह हमारे जीवन में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। बल्कि कई सफल लोग अपनी असाधारण योग्यता, ज्ञान या अनुभव की वजह से नहीं बल्कि किस्मत की वजह से वहाँ पहुँचे। वे आपको यह नहीं बताएँगे — सब अपने व्यक्तिगत गुणों को उजागर करना चाहते हैं, किस्मत की भूमिका कबूल नहीं। वे अपनी सफलता सिर्फ अनुभव और ज्ञान को देते हैं, किस्मत को नहीं। मैं यह नहीं कहता कि वे अपने काम में अच्छे नहीं, लेकिन शायद सबसे बेहतर भी नहीं। दूसरी परिस्थितियों में कुछ लोग वह सौदा न कर पाते, तो कुछ सबसे अच्छे ब्रोकर या मैनेजर न बन पाते।
कुछ हद तक मेरी अपनी मौजूदा मध्यवर्ती सफलताएँ और कामयाबियाँ भी किस्मत की बदौलत हैं। इसके साथ ही मैं खुद को किस्मत वाला इंसान नहीं कहूँगा; मैं भी बाकी लोगों जैसा हूँ। किस्मत सिद्धांततः पसंदीदा नहीं चुनती — उसके लिए हम सब बराबर। एकमात्र कारक जिससे किस्मत किसी पर मेहरबान होती है वह है सक्रियता। जब इंसान हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठता बल्कि कुछ करने की कोशिश करता है, तो वह अपने मौके बढ़ाता है। किसी मामले में किस्मत एक संभाव्यता जैसी चीज़ है, जहाँ नाकामी और कामयाबी दोनों मुमकिन। सब जानते हैं कि पड़े पत्थर के नीचे पानी नहीं बहता। यानी लॉटरी जीतने के लिए भी कम से कम टिकट तो खरीदना पड़ेगा। ज़्यादा जटिल हालात में, ताकि किस्मत निजी ज़िंदगी या काम में आपकी तरफ मुड़े, कम से कम काम करना होगा। देर-सवेर किस्मत आपके शुरू किए कामों पर मेहरबान होगी — अगर सब पर नहीं तो कम से कम कुछ पर।