पूर्वाग्रह, डर, बड़ी पीढ़ियों का अनुभव, अंधविश्वास और ऊपर देखे गए दूसरे कारक मिलकर इंसान में संज्ञानात्मक विषमता (cognitive bias) बनाते हैं। यह विषय सोच वाले अध्याय में भी छुएंगे, जहाँ अंतर्ज्ञान पर विस्तार से बात करेंगे।
संज्ञानात्मक विषमताएँ और कुछ नहीं बल्कि सोच के ऐसे पैटर्न हैं जहाँ दिमाग अंतर्ज्ञान (सिस्टम 1) पर भरोसा करके गलती करता है, बजाय इसके कि मामला विचार (सिस्टम 2) को सौंप दे। अगर तुम्हें कुछ समझ नहीं आया तो सामान्य है — बाद के अध्याय में विस्तार होगा। लेकिन संज्ञानात्मक विषमताएँ हमारी उत्पादकता और योजना के लिए नकारात्मक हैं (गलत लक्ष्य, अप्रभावी अमल), इसलिए "धीमा करने वाले कारक" में एक बिंदु ज़रूरी था।
विषमताएँ रोज़मर्रा और काम दोनों में पैदा हो सकती हैं — परिवार, समाज, योजना बनाते या बस बातचीत में। यानी जहाँ भी थोड़ी भी सोच या दिमाग की प्रतिक्रिया चाहिए। जवाब देते वक्त हम खुद नोट नहीं करते कि हम — या हमारा अंतर्ज्ञान — हमारी ओर से गलत जवाब दे रहा है।
संज्ञानात्मक विषमताएँ कहाँ से आती हैं और कब दिखती हैं? खासकर इन हालात में:
1) दुनिया को समझने की कठिनाई — मेरे लिए सबसे आम समस्या; मौजूदा डेटा से दिमाग में तस्वीर पूरी करना नए डेटा का विश्लेषण करने से आसान और तेज़; दिमाग ज्ञान की पहेली की खाली जगह रूढ़ियों और पुराने अनुभव से भरता है; ज़्यादातर लोग धार्मिक और ज्योतिषीय ढंग से सोचते हैं, डार्विन, विकास और भौतिकी के नियमों से नहीं।
2) जानकारी की भरमार: दिमाग सिर्फ़ समझ आने वाला लेता है।
3) तेज़ प्रतिक्रिया की ज़रूरत: विश्लेषण छोड़कर सीधे निष्कर्ष।
4) क्या याद रखना है: समय की इकाई में दिमाग सीमित याद रख सकता है; हम सामान्यीकरण और चमकदार ब्योरे याद रखते हैं।
विषमताओं से पूरी तरह छुटकारा मुश्किल। लेकिन कोई विचार या जवाब बनाते वक्त खुद से पूछते रहो: "यह तथ्य है या मेरा विचार?" अगर विचार है तो जाँच लो। संज्ञानात्मक विषमताएँ पूरी किताब भर सकती हैं; मैं इस क्षेत्र का विशेषज्ञ नहीं। ज़रूरी यह कि विषय उठा दिया, तुम जानते हो और दिलचस्पी हो तो खुद इंटरनेट पर ढूँढ सकते हो या किताब पढ़ सकते हो।